सत्य व्यास का बहुचर्चित हिंदी उपन्यास 'बनारस टॉकीज़' पढ़ा। सच कहूँ तो इस उपन्यास को लेकर मुझे कई पूर्वाग्रह थे। 'अनअदर स्टूडेंट लाइफ स्टोरी'!!! वही तीन-चार लूज़र टाइप दोस्तों की कहानी!!! कुछ रैगिंग के सीन। कुछ एक्सेन्ट्रिक टीचर। कुछ कार्टूननुमा स्टूडेंट। हॉस्टल और कैंपस में पनपती एक प्रेम कहानी। और इनके इर्द-गिर्द छिड़की हुई कुछ मस्ती, नोक-झोंक और गाली-गलौज। मगर पुस्तक का नाम काफ़ी सुन रखा था। कुछ रिकमेन्डेशन भी थे। सो उपन्यास मैंने पढ़ना शुरू किया, मगर उन्हीं पूर्वाग्रहों के साथ। लेकिन सत्य व्यास की दाद देनी होगी। उन्होंने स्टीरियोटाइप को बरक़रार रखते हुए भी मेरे पूर्वाग्रहों को बखूबी तोड़ा। पुस्तक इन्हीं स्टीरियोटाइप को लेकर आगे बढ़ती है, मगर उन्हीं टकसाली किरदारों और उनके बीच घटते जाने-पहचाने वाकयों के बीच से भी कुछ नया ही डिज़ाइन बुनकर उभरता दिखाई देता है। और खासियत उस डिज़ाइन की कि वह कोई इम्पोर्टेड डिज़ाइनर पोशाक नहीं बल्कि घर के बुने मुलायम ऊनी स्कार्फ़ की शक्ल में ही ढलता है, मगर जब वह बुन कर सामने आता है तो आखें हैरत से ख़ुद को झिड़कती हैं, पगली ये तेरे सामने ही तो बुन रहा था। कहानी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के कैंपस और भगवान दास हॉस्टल में रची है। सत्य व्यास स्वयं बीएचयू के अलम्नस हैं और बीएचयू के परिवेश को उन्होंने बखूबी जिया है। कहानी तीन मित्रों या बी.डी. जीवियों की है, बी.डी जीवी यानि बुद्धिजीवियों को अपमानित करते भगवानदास जीवी। जयवर्धन शर्मा, यानि जयवर्धन जी, अनुराग डे यानि दादा और सूरज यानि बाबा और कहानी के सूत्रधार। किरदार और भी हैं और साथ ही हैं जैसा लाज़मी है, गर्ल्स हॉस्टल की रिहाया और सूरज की गर्लफ्रेंड शिखा जो कहानी के अंत तक हाफ गर्लफ्रेंड की तरह ही पेश आती हैं। कहानी सभी किरदारों को लपेटते आगे बढ़ती है, मस्ती, चुहलबाज़ी, गालीगलौज से होते हुए कुछ रोमांचक रोमांस और एक रूमानी रोमांच तक। उपन्यास पढ़ते हुए कई बार लगता है कि जैसे कहानी मोदी एक्सप्रेस की तरह बढ़ रही हो, घट तो बहुत कुछ रहा है, सीटियां भी खूब मार रही है, मगर भाई जा कहाँ रही है? और यही पुस्तक की खूबी है, बकौल पुस्तक की शुरुवात में ही लिखे इस फ़लसफ़ी कोट, 'हर घटना के पीछे कोई कारण होता है, संभव है यह घटित होते वक्त आपको न दिखे; लेकिन अंततः जब यह सामने आएगा, आप सन्न रह जाएंगे'सत्य व्यास की भाषा और शैली की तारीफ करनी होगी। एक ऐसी शैली जिसमें न तो किसी बौद्धिकता का प्रपंच है, और न ही किसी फ़िल्मी फॉर्मूले की बुनावट। बस जैसे का तैसा, बिलकुल भदेसी अंदाज़, जैसे कि अमृतलाल नागर जी का 'सेठ बांकेमल' पढ़ रहे हों। और बीएचयू के जिस परिवेश में कहानी रची गई है उसमें यह अंदाज़ फिट भी खूब बैठता है। मगर एक बात पुस्तक में मुझे काफी खली, वह है रोमन लिपि की मौजूदगी, जो मुझे लगा कि ज़रूरी नहीं थी। एक ऐसे समय में जब चेतन भगत यह दावा करते हों कि देवनागरी के दिन लद गए हैं और हिंदी को भी रोमन लिपि में लिखा जाना चाहिए, हिंदी उपन्यास में रोमन लिपि की मौजूदगी कहीं न कहीं आशंकित करती है कि चेतन भगत का दावा सच की शक्ल न इख्तियार कर ले। पुस्तक में अंग्रेजी के वाक्यों को देवनागरी में लिखकर इस दावे को एक अच्छा जवाब दिया जा सकता था।खैर इसके अलावा उपन्यास बेहद रोचक है, ज़रूर पढ़ें और आनंद लें, और थ्री ईडियट्स से तुलना न करें, 'बनारस टॉकीज़' का अपना अंदाज़ है, आगाज़ जैसा भी हो मगर अंजाम…….आखें खुद को झिडकती हैं, पगली …..
Wednesday, 15 March 2017
पुस्तक समीक्षा - बनारस टॉकीज़
सत्य व्यास का बहुचर्चित हिंदी उपन्यास 'बनारस टॉकीज़' पढ़ा। सच कहूँ तो इस उपन्यास को लेकर मुझे कई पूर्वाग्रह थे। 'अनअदर स्टूडेंट लाइफ स्टोरी'!!! वही तीन-चार लूज़र टाइप दोस्तों की कहानी!!! कुछ रैगिंग के सीन। कुछ एक्सेन्ट्रिक टीचर। कुछ कार्टूननुमा स्टूडेंट। हॉस्टल और कैंपस में पनपती एक प्रेम कहानी। और इनके इर्द-गिर्द छिड़की हुई कुछ मस्ती, नोक-झोंक और गाली-गलौज। मगर पुस्तक का नाम काफ़ी सुन रखा था। कुछ रिकमेन्डेशन भी थे। सो उपन्यास मैंने पढ़ना शुरू किया, मगर उन्हीं पूर्वाग्रहों के साथ। लेकिन सत्य व्यास की दाद देनी होगी। उन्होंने स्टीरियोटाइप को बरक़रार रखते हुए भी मेरे पूर्वाग्रहों को बखूबी तोड़ा। पुस्तक इन्हीं स्टीरियोटाइप को लेकर आगे बढ़ती है, मगर उन्हीं टकसाली किरदारों और उनके बीच घटते जाने-पहचाने वाकयों के बीच से भी कुछ नया ही डिज़ाइन बुनकर उभरता दिखाई देता है। और खासियत उस डिज़ाइन की कि वह कोई इम्पोर्टेड डिज़ाइनर पोशाक नहीं बल्कि घर के बुने मुलायम ऊनी स्कार्फ़ की शक्ल में ही ढलता है, मगर जब वह बुन कर सामने आता है तो आखें हैरत से ख़ुद को झिड़कती हैं, पगली ये तेरे सामने ही तो बुन रहा था। कहानी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के कैंपस और भगवान दास हॉस्टल में रची है। सत्य व्यास स्वयं बीएचयू के अलम्नस हैं और बीएचयू के परिवेश को उन्होंने बखूबी जिया है। कहानी तीन मित्रों या बी.डी. जीवियों की है, बी.डी जीवी यानि बुद्धिजीवियों को अपमानित करते भगवानदास जीवी। जयवर्धन शर्मा, यानि जयवर्धन जी, अनुराग डे यानि दादा और सूरज यानि बाबा और कहानी के सूत्रधार। किरदार और भी हैं और साथ ही हैं जैसा लाज़मी है, गर्ल्स हॉस्टल की रिहाया और सूरज की गर्लफ्रेंड शिखा जो कहानी के अंत तक हाफ गर्लफ्रेंड की तरह ही पेश आती हैं। कहानी सभी किरदारों को लपेटते आगे बढ़ती है, मस्ती, चुहलबाज़ी, गालीगलौज से होते हुए कुछ रोमांचक रोमांस और एक रूमानी रोमांच तक। उपन्यास पढ़ते हुए कई बार लगता है कि जैसे कहानी मोदी एक्सप्रेस की तरह बढ़ रही हो, घट तो बहुत कुछ रहा है, सीटियां भी खूब मार रही है, मगर भाई जा कहाँ रही है? और यही पुस्तक की खूबी है, बकौल पुस्तक की शुरुवात में ही लिखे इस फ़लसफ़ी कोट, 'हर घटना के पीछे कोई कारण होता है, संभव है यह घटित होते वक्त आपको न दिखे; लेकिन अंततः जब यह सामने आएगा, आप सन्न रह जाएंगे'सत्य व्यास की भाषा और शैली की तारीफ करनी होगी। एक ऐसी शैली जिसमें न तो किसी बौद्धिकता का प्रपंच है, और न ही किसी फ़िल्मी फॉर्मूले की बुनावट। बस जैसे का तैसा, बिलकुल भदेसी अंदाज़, जैसे कि अमृतलाल नागर जी का 'सेठ बांकेमल' पढ़ रहे हों। और बीएचयू के जिस परिवेश में कहानी रची गई है उसमें यह अंदाज़ फिट भी खूब बैठता है। मगर एक बात पुस्तक में मुझे काफी खली, वह है रोमन लिपि की मौजूदगी, जो मुझे लगा कि ज़रूरी नहीं थी। एक ऐसे समय में जब चेतन भगत यह दावा करते हों कि देवनागरी के दिन लद गए हैं और हिंदी को भी रोमन लिपि में लिखा जाना चाहिए, हिंदी उपन्यास में रोमन लिपि की मौजूदगी कहीं न कहीं आशंकित करती है कि चेतन भगत का दावा सच की शक्ल न इख्तियार कर ले। पुस्तक में अंग्रेजी के वाक्यों को देवनागरी में लिखकर इस दावे को एक अच्छा जवाब दिया जा सकता था।खैर इसके अलावा उपन्यास बेहद रोचक है, ज़रूर पढ़ें और आनंद लें, और थ्री ईडियट्स से तुलना न करें, 'बनारस टॉकीज़' का अपना अंदाज़ है, आगाज़ जैसा भी हो मगर अंजाम…….आखें खुद को झिडकती हैं, पगली …..
Thursday, 9 March 2017
पुस्तक समीक्षा - दिल्ली दरबार
‘दिल्ली दरबार’ सत्य व्यास का दूसरा उपन्यास है.
उनके पहले लोकप्रिय उपन्यास ‘बनारस टाकीज़’ से ही मैं सत्य व्यास की भाषा, शैली और
स्टोरी टेलिंग का कायल हो चुका हूँ, इसलिए यह जानने की उत्सुकता अधिक थी कि दिल्ली
दरबार में नया क्या है. वैसे सत्य व्यास की एक ख़ासियत यह भी है कि वे तकरीबन एक सी
बातों को भी कुछ ऐसे अंदाज़ में कह जाते हैं कि हर बार एक नया लुत्फ़ मिलता है.
दिल्ली दरबार में भी कुछ ऐसा ही है कि पहले पन्ने से ही गुदगुदी शुरू हो जाती है और
बात-बात पर बेसाख्ता हँसी फूट पड़ती है, और यह सिलसिला अंत तक जारी रहता है.
खैर उपन्यास की कहानी पर आएँ. हर चैप्टर का
टाइटल ‘साहब बीवी और ग़ुलाम’ फिल्म और उसके गानों से लिया गया है, जिसका वैसे तो कहानी से कोई
सीधा सम्बन्ध नहीं है मगर फिर भी इससे लेखक की एडिशनल क्रिएटिविटी का पता चलता है.
कहानी टाटानगर के राहुल मिश्रा की है जो उनके मित्र मोहित सिंह कह रहे हैं. पहले
ही चैप्टर ‘साहब’ में मोहित के ज़रिये राहुल मिश्रा का जो लुच्चा किरदार लेखक ने
खींचा है वो ज़बर्दस्त है. इस धमाकेदार शुरुआत से ही पाठक कहानी से खुद ही गोंद की तरह
चिपक जाता है.
दूसरे चैप्टर ‘साहिल की तरफ़ कश्ती ले चल’ से राहुल और मोहित का दिल्ली का सफ़र और दिल्ली की कहानी शुरू होती है. दिल्ली तक कश्ती पहुँचने की तो कोई ख़ास कहानी नहीं है, मगर दिल्ली पहुँच कर उसके पल-पल डगमगाने और संभलने की कहानी ही बाकी कहानी है. इस चैप्टर की शुरुआत में सत्य व्यास जिस तरह दिल्ली शहर से वाकिफ़ कराते हैं उससे उनकी मंझी हुई भाषा-शैली का एक और नया और संजीदा नमूना देखने मिलता है.
दूसरे चैप्टर ‘साहिल की तरफ़ कश्ती ले चल’ से राहुल और मोहित का दिल्ली का सफ़र और दिल्ली की कहानी शुरू होती है. दिल्ली तक कश्ती पहुँचने की तो कोई ख़ास कहानी नहीं है, मगर दिल्ली पहुँच कर उसके पल-पल डगमगाने और संभलने की कहानी ही बाकी कहानी है. इस चैप्टर की शुरुआत में सत्य व्यास जिस तरह दिल्ली शहर से वाकिफ़ कराते हैं उससे उनकी मंझी हुई भाषा-शैली का एक और नया और संजीदा नमूना देखने मिलता है.
कहानी में ‘साहब’ राहुल मिश्रा हैं और ‘बीवी’
हैं दिल्ली में उनके मकान मालिक बटुक शर्मा की बिटिया ‘परिधि’. कहानी में एक ग़ुलाम
या नौकर भी है जिसके रहस्यमयी किरदार की हक़ीकत अंत में ही खुलती है. कहानी अच्छी
और कसी हुई है मगर उसमें ऐसी कोई नवीनता नहीं दिखती जो उसे बनारस टाकीज़ से बेहतर
साबित कर सके. कहानी के मोर्चे पर दिल्ली दरबार, बनारस टाकीज़ के मुक़ाबले थोड़ा
निराश करती है.
दिल्ली दरबार में दिल्ली उतनी भी नहीं है जितना
बनारस टाकीज़ में बनारस है, मगर जैसा कि सत्य व्यास खुद कहते हैं कि यह ‘दिल्ली में’
कहानी है, न कि ‘दिल्ली की’ कहानी, इसलिए यह टाइटल जस्टिफाई किया जा सकता है.
किताब की भाषा-शैली उम्दा है, हास्य इतना कूट-कूट कर भरा है कि हर पन्ने से फूट-फूट
कर निकलता है. हालाँकि कहीं कहीं आपको हास्य का स्तर हल्का या सस्ता भी लगे मगर जब
लेखक खुद पर 176 पन्नों का धारावाहिक हास्य परोसने की ज़िम्मेदारी ले तो कहीं-कहीं
ऐसा होना लाज़मी भी है और वाजिब भी. राहुल मिश्रा और मोहित के संवाद लोटपोट करने
वाले हैं और उस पर मोहित के कहे ग़ालिब के अशआरों का राहुल मिश्रण पेट पकड़ने पर
मजबूर कर देता है.
कुल मिलाकर दिल्ली दरबार बेहतरीन किताब है, यदि कहानी
भी किताब के बाकी पहलुओं से बराबर तालमेल रखती तो किताब बेहतरीन से भी आगे बढ़कर हो
सकती थी.
Tuesday, 10 January 2017
शर्तिया इश्क़
शकील समर की किताब ‘शर्तिया इश्क़’ पढ़ी. इस किताब को पढ़ने की इच्छा बहुत समय से थी, मगर पढ़ना अब जाकर हो पाया. मुझे इस किताब का शीर्षक बेहद दिलचस्प लगा, शर्तिया-इश्क़. इश्क़ वैसे तो हो जाता है बिना किसी शर्त के ही, मगर किया अमूमन शर्तों पर ही जाता है. और यही होने और करने के बीच का फ़र्क ही इंसानी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी जद्दोजहद होता है. हम होते कुछ हैं, होना शायद कुछ और चाहते हैं, और करते कुछ और ही हैं. और इसी ‘कुछ और’ करने के दौरान ही अक्सर हम ये discover करते हैं कि हम हैं कौन, हमारी ख़ासियत क्या है, और किस ख़ास मुकाम पर हमारी मंज़िल है. इस फ़लसफ़े को शकील ने बेहद ख़ूबसूरती से किताब की कहानी में पिरोया है.
इसी ‘कुछ ख़ास’ होने से ‘बहुत कुछ’ हो जाने की हसरत के बीच खिंच रही है कहानी की नायिका वाणी की ज़िंदगी. और ‘बहुत कुछ’ ठुकरा कर ‘कुछ ख़ास’ को पाने के सफ़र में है कहानी का नायक कबीर. लिहाज़ा दोनों को मिलना है. कबीर को वाणी में जो ख़ास है, वह बेहद पसंद है, और वाणी को यह पसंद है कि वह कबीर को बेहद पसंद है. और इसीलिए उन दोनों के बीच इश्क़ होना भी लाज़मी है. इस इश्क़ में शर्त क्या है, यह तो पता नहीं मगर शायद वह व्यक्तिगत पसंद से अधिक कुछ नहीं है. मगर इश्क़ जब वक्त के पालने में पलता है तो उसके हर किस्म के टैन्ट्रम शुरू हो जाते हैं जिन्हें तरह तरह के झुनझुनों से बहलाए रखना पड़ता है. और वक्त जब इस नर्म पालने से उतर कर हकीकत की सख्त ज़मीन पर सफ़र करने का, यानी शादी और घर-गृहस्थी का आता है तो उस पर कई शर्तें भी किसी वेताल की तरह आ लदती हैं. कबीर के वाणी को शादी के लिए प्रोपोस करते ही दोनों का इश्क़ भी इन्हीं शर्तों का बोझ लादे सफ़र करने लगता है, तब तक जब तक कि वाणी को यह अहसास नहीं हो जाता कि इश्क़ को किसी मुक़ाम तक पहुंचाने की ज़रूरत नहीं होती, इश्क़ अपने आप में एक मुक़ाम होता है.
कहानी में वाणी और कबीर के साथ ही कई और किरदार भी सफ़र कर रहे हैं जिमें सबसे अहम है दोनों का कॉमन फ्रेंड अभिषेक, जो वाणी की शर्तों के वेताल में कहीं न कहीं उतरा हुआ है. कबीर, वाणी और अभिषेक का यह त्रिकोण यश चोपड़ा की किसी भी फिल्म के लव-ट्रायंगल से कहीं अधिक दिलचस्प और इन्ट्रीगिंग है. पात्रों का चित्रण भी बहुत खूब है. कहानी के लगभग हर अहम किरदार की तस्वीर आपकी आखों के सामने आ खड़ी होती है. कहानी की गति भी अच्छी है. 272 पन्नों की इस किताब को पढ़ते हुए कहीं भी कोई ब्रेक देने का मन नहीं करता. छोटी-मोटी खामियों के बावजूद, कहानी के फ्रंट पर शकील भाई को पूरे सौ नंबर देने का मन करता है.
मगर इस किताब में जो बातें मुझे खटकीं उनमे सबसे पहले है प्रूफ़ की कई गलतियाँ जो कई जगह एक दिलचस्प कहानी की रवानगी को तोड़ती हैं. दूसरी बात जो मुझे लगी वह यह कि भाषा और शैली पर थोड़ी और मेहनत होनी चाहिए थी, या फिर थोड़ी कम ताकि यह न लगे कि उसे एक साहित्यिक रूप देने की कोशिश हो रही है, जिसमें वह पूरी तरह खरी नहीं उतर रही. शकील भाई यदि भाषा और शैली में थोड़ी और महारत हासिल कर लें तो वे हिंदी के अग्रणी लेखकों की लिस्ट में आसानी से आ खड़े हो सकते हैं और या फिर सादगी से सिर्फ कहानी कहने पर ध्यान दें तो भी किस्सागोई का उस्ताद बनने की सारी संभावनाएँ उनमें दिखती हैं.
खैर यदि आप एक रोचक और इन्ट्रीगिंग कहानी पढना चाहते हैं तो शर्तिया इश्क़ ज़रूर पढ़ें. किताब उठाने के बाद उसे ख़त्म किये बिना रखने का आपका दिल नहीं चाहेगा. शकील भाई को शर्तिया इश्क के लिए बहुत बहुत मुबारकबाद. आगे भी ऐसा ही और इससे बेहतर भी लिखते रहें, इस उम्मीद के साथ.
Book Review - Graffiti
I got a copy of this book from the author in exchange for an honest review. It took me quite a while to read the book partly because I am a slow reader and partly because it's a long tale of complex human emotions and relationships involving too many characters and incidents.
But it's an interesting read, a complex drama involving tragedy, humour and romance with a serious philosophical underpinning. The quirky characters and satirical humour kept tickling me throughout the reading.
The writing style is impressive but the book could have done better with a little more editing. Overall an impressive read. Would definitely recommend.
Monday, 18 July 2016
Book Review - The Claim
‘The Claim’ is a crime thriller by Sanjay Bordia. Since I haven’t had read a crime thriller for quite a while, I picked the book up with a keen interest and with an expectation to read an intriguing crime mystery. The book starts off well and builds a nice suspense around the accidental death of a young entrepreneur Prabhat Mehra.
The story opens with these lines - “Car skids in gorge, young life lost” was the headline of a small news item on the fifth page of the newspaper.
Prabhat Mehra had taken out a life insurance policy for a hefty amount of Rupees 10 Crores from ‘3M Chandani Group’. K.P. Mehra, father of Prabhat Mehra and his twin brother Prakash Mehra, files the insurance claim but the accidental death of Prabhat Mehra only after a couple of months of taking out the insurance policy and the large sum of insurance claim raises a suspicion around the genuineness of the claim. The insurance company asks its internal auditor Mohan to investigate the case. Mohan along with his young, gorgeous and chirpy assistance Laila and another sharp and astute internal auditor Narsimha Rao aka Iceberg sets out on the investigation only to find that all papers and evidence are in order to prove the case genuine and yet giving him an eerie feeling that something isn’t right.
The story is gripping, characters of Mohan and Laila are well developed and especially Laila’s fondness for food and making parodies of Hindi movie songs using names of food items keeps readers amused. However, at the same time Mohan’s strange habit of quoting from Mahabharat every now and then feels irky after a couple of occasions. Also the story going back and forth making rounds of some subplots not bearing any direct relation to the central plot breaks the pace of the story. Though the story is intriguing, almost at the halfway through the story you can make an easy guess where the story is going to end.
Overall it’s an interesting read and you will like it if you are a crime fiction lover, but some minor flaws in the story narration and predictability of the end will also disappoint you at the same time. I would give the book 3 stars.
Sunday, 5 April 2015
Book Review - Vasu and the Matsya Temple
‘Vasu and the Matsya Temple’ is a gripping story of a
blessed boy Vasu, who destiny chooses to go on a fun-filled heroic journey on the very day of his birth. A journey which in the
end will free the world from the clutches of the vicious struggles of power
and bring peace and harmony on the earth. The long lost sacred Ashtmangala
symbols created by the Matsya Avataar of Lord Vishnu are key to these power
struggles and Vasu is on an adventures journey to find them to bring an end to fierce
battles and savage wars.
The story is the
first part of a trilogy ‘Ashtamangala Adventures of Vasu’ by Rajiv Tanwar who is
an orthopaedic surgeon by profession and a passionate story teller and a writer
by choice. The book is a fantasy fiction
that narrates an incredible journey of the young boy Vasu which through various
twists and turns keeps the readers spellbound.
Vasu son of an archaeologist
Shridhar Gupta is kidnapped on the day of his birth by evil Samraat Viraat
Shatru. The reason is that his father stumbles across a locket during a
research in a jungle and puts it in the neck of the child. The mysterious
locket has one of the eight Ashtmangala symbols on it. The king of the oceanic
world Maharaja Siddhivarun ailing and trapped under the spells of his new wife Rani
Roopmati, frees him with the help of Guru Nagarjuna the Raj Vaidya of the sea
kingdom. Here on starts the adventurous journey of Vasu from the enchanted oceans
to the mesmerizing jungles, from the depths of the seas to the planes of the
earth, from Triveni Sangam in Allahabad to the enigmatic Matsya temple, which
finally links to the devastating tsunami of 2004. There are other brave children
in this gallant journey of Vasu which also include the young daughter of
Maharaja Siddhivarun, Aishwarya. The courage and valor of the young children display
a perfect example of self-belief and valiance that children should be
inculcated with from a very young age. The characters are well-developed and
the story is well-narrated. Though at places especially in the first five
chapters I felt that the story needed to be carried forward more by the
characters than told by the author himself.
However I found ‘Vasu and the Matsya Temple’ a very
interesting read, a fantastic fantasy tale which every child should read or
should be read to by the elders. But the book is not only for the children, it can
mesmerise readers of any age. I congratulate Mr Rajiv Tanwar for this brilliant
book and very much look forward to reading the other two parts of the trilogy.
The book can be bought from Amazon -
http://www.amazon.in/Vasu-Matsya-Temple-Rajeev-Tanwar/dp/9384180319/ref=sr_1_1?ie=UTF8&qid=1428263403&sr=8-1&keywords=vasu+and+the+matsya+temple
The book can be bought from Amazon -
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Sunday, 1 February 2015
पुस्तक समीक्षा - छुटपन के दिन
बचपन में हम चन्दामामा पढ़ा करते थे। पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियां पढ़ा करते थे। वेताल पच्चीसी और सिंहासन बत्तीसी के किस्से पढ़ा करते थे। ये किस्से कहानियां हमें गुदगुदाते, हँसाते और थोड़ा रुलाते भी। मगर इसी हंसी और गुदगुदी में लिपटी होती कोई नसीहत। छुपा होता कोई सन्देश। इन किस्सों की खासियत यह होती के ये इतने दिलचस्प होते कि इन्हें सिर्फ बच्चे ही नहीं बड़े भी बड़े चाव से पढ़ते। और इनमें लिपटी नसीहतें भी इतनी रसीली होतीं कि झट उम्र के सारे फ़ासले पार कर बुज़ुर्गों से बच्चों तक पहुँच जातीं। बस ऐसा ही कि कुछ तुषार उप्रेती की पुस्तक 'द डेज़ ऑफ़ चाइल्डहुड ' (उनकी हिंदी किताब 'छुटपन के दिन' का अंग्रेजी अनुवाद) पढ़ते हुए लगा। लगा कि बचपन में पहुँच कर बालभारती या चन्दामामा हाथ में पकड़ ली हो। नंदन या पराग की महक लपेट ली हो। छोटे छोटे गागर जैसे किस्से और उनमें भरी किसी विशाल सागर जैसी रोचकता। किस्सों की भाषा सरल और पात्रों के नाम भी गज़ब, जैसे पड़ोस के गली-मुहल्लों में खेलने वाले बच्चे। टिल्लू, अप्पू, नम्मो, पप्पी और वैसे ही उन्हें खेल खेल में ज्ञान और नसीहत देने वाले ज्ञान चाचा या दीनू चाचा। एक बेहद देसी परिवेश मगर रोचकता, ज्ञान और नसीहतें जो दुनिया के हर हिस्से में काम आयें। तुषार उप्रेती का यह प्रयास बेहद उम्दा है। एक ऐसे समय में जब बच्चे पीएस 4 या एक्सबॉक्स का रिमोट कंट्रोल हाथों में थामे फौजी टैंकों या मिसाइलों के शोर में गुम हों यह किताब और इसके किस्से बच्चों को बचपन की दुनिया की आबोहवा में लाते हैं, जहाँ सहजता है, सरलता है, सुकून है। हालांकि अंग्रेजी अनुवाद पढ़ते हुए लगा कि आनंद का कुछ हिस्सा कहीं अनुवाद में गुम हो गया, मगर जो बचा वह भी कम न था। यदि आप वाकई कुछ समय के लिए वयस्कता के तनावों से दूर छुटपन के दिनों की सैर पर निकलना चाहते हैं तो यह किताब ज़रूर पढ़ें। और यदि अपने बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक गेम्स के शोर से दूर सुकून की आबोहवा में ले जाना चाहते हैं तो उन्हें भी यह किताब ज़रूर पढ़ने को दें.।
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